प्रिय पापाजी
अरसा तो हुआ है कोई भी ख़त लिखे. मगर गुनाह न आपका न मेरा, अगर है तो दोनों का ही. एक वक़्त था जब हमराह, हमसफ़र था दोनों के दिल का हाल. अब वक़्त बदल गया है शायद. ब्लॉग पे लिखने के बाद फ़ोन पे भी बाल कि खाल उधेड़ते थे, शायद दिक्क़तें समान हुआ करती थीं शायद. अब हैं अलग-अलग, पर कोई बात नहीं. जिस दिन से फीते बाँध कर चलना शुरू किया है, उस दिन से एक ही बात समझ में आती है. इस राह का अपना एक किरदार है, बिछड़ना मिलना कोई ख़ास बात नहीं... बस एक सिलसिला है मुसलसल, ये करवाती है हमसे. तब के गए थे, अब जो वापस आये हैं, तो उठाते हैं वही सिरा जिसे छोड़ा था. बैठने दो फिर वही महफ़िल, भिड़े इक बार फिर वही तांता. बहुत कोशिश करी हमनें कि वक़्त से पहले हो पाता मगर... आगे जो है वो already आपकी-मेरी जुबां पर है.
तो हो जाए. इक नया पन्ना है इक नए साल का. अब तो creative pursuit भी एकदिशा है. अब तो मिल के काम भी करना है, मेरी आशा तो यह है कि बरसों कि दबी जो वो लालसा है अन्दर, मेरी कहानियों के ज़रिये निकले बाहर. और यहाँ मुझे ललचाने के लिए रखा ही क्या है, कोई लालच होता तो चैनल या कॉल-सेंटर ही क़ाफ़ी होता. पर आपका बेटा हूँ, इस progressive society में इतना समझदार कहाँ? मुझे तो बस दिल खोलने को एक कागज़ मिले, और रंग उठा कर उस पर डोलूं, इतना ही लालच है. पर अकेले खेलने में वो बात कहाँ. एक लड़का और है जो खेला करता था मेरे साथ. अब कहता है मैं बड़ा हूँ... खेलूँगा नहीं पर कुछ-कुछ कहा करूँगा. कोई नहीं, यही सही...
तो सरकार, पंगा आप ही ने लिया है. जा पंगा लिया वो निभाना पड़ेगा. अभी कहना बहुत 'तन्हा' को है, सुनना बहुत मुझे...
बेटा
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